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हार्ट की बीमारी से बचना है तो दूध, दही, मक्खन जरूर लें!

कहीं आप तो उन लोगों की तरह भ्रमित तो नहीं जिन्होंने हार्ट अटैक या हृदय रोगों से बचने के लिए दूध, दही, मक्खन को छोड़ दिया है। यदि ऐसा है तो आपको इस शोध पूर्ण लेख को अवश्य पढ़ना चाहिए।

यह बात सत्य है कि हृदय रोग बड़ी तेजी से बढ़ रहे हैं उनमें भी हृदय रोग से युवक-युवतियाँ पीड़ित हो रही हैं यह और चिंताजनक है। इसलिए यह तो आवश्यक है कि आप अपने हृदय को स्वस्थ रखने के लिए अपने खान-पान, अपनी जीवनशैली पर ध्यान दें। मगर इसके दूध, दही, मक्खन छोड़ने की बिल्कुल जरूरत नहीं। बिल्कुल सही, हम कह रहे हैं कि वैज्ञानिकों का मानना है कि दूध और दूध से बने पदार्थ आपकी हार्ट के दुश्मन नहीं, बल्कि बहुत ही लाभकर है।

‘‘सिडनी में जॉर्ज इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ के वरिष्ठ शोधकर्ता मैटी माकिलंड के अनुसार लोगों में डेयरी उत्पादों के खतप का अध्ययन किया। इस अध्ययन के अनुसार दूध, दही, पनीर, मक्खन जैसे डेयरी उत्पादों के सेवन से हृदय सम्बन्धी रोगों का जोखिम नहीं रहता। यह भ्रम धारणा है जिन्होंने इस धारणा को आप में डाला है उन्हें ज्ञान नहीं है।

मैटी माकिलंड ने कहा कि हमने अपने रिसर्च में पाया है कि पर्याप्त मात्रा में दूध, मक्खन दही का सेवन करने वाले लोगों में कार्डियो वैस्क्यूलर (हृदय रोग) का सबसे कम जोखिम था। यह तो हो गया आधुनिक शोध।

अब आप वैदिक चिकित्सा विज्ञान को पढ़ें-

हृदय की सेहत में ‘ओज’ का प्रमुख स्थान है। ओज हमारे हृदय की सुरक्षा करता है उसे ताकतवर रखता है, ओज का स्थान भी हृदय है और गाय का दूध-

स्वादु शीतं मृदु स्निग्धं बहलं श्लक्ष्णपिच्छिलम्।
गुरु मन्दं प्रसन्नं च गव्यं दशगुणं पय:।।
तदेवगुणमेवौज: सामान्यादभिवर्धयेत्।
प्रवरं जीवनीयानां क्षीरमुक्तम् रसायनम्।।

च.सू. २७/२१७-२१८।।

गोदुग्ध रस में स्वादु, वीर्य में शीत, गुण में मृदु, स्निग्ध बहल (गाढ़ा) श्लक्ष्ण, पिच्छिल, गुरु, मन्द और प्रसन्न इन दश गुणों से युक्त होता है। इस दश गुणों से युक्त दूध, इन्हीं दश गुणों वाले ओज का साम्य रखने के कारण उसकी वृद्धि करता है। यह गोदुग्ध जीवनीय शक्ति प्रदान करने वाले द्रव्यों में सर्वश्रेष्ठ और रसायन है।

आचार्य भावप्रकाश तो सीधे-सीधे लिख देते हैं कि-

दुग्धं सुमधुरं स्निग्धंवातपित्तहरंसरम्।
सद्य: शुक्रकरं शीतंसात्म्यं सर्वशरीरिणाम्।
जीवनं बृहणंबल्यं मेध्यं बाजीकरं परम्।
वय: स्थापनमायुष्यं संधिकारिरसायनम्।
... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ...
ग्रहण्यांपाण्डुरोगेच दाहतृषिहृदामये।।

अर्थात् गोदुग्ध मधुर, स्निग्ध, वात-पित्त हारक, दस्तावर, शुक्र को तुरन्त उत्पन्न करने वाला तथा सभी शरीर धारियों के अनुकूल यह जीवनदायक, बलवर्धक, धातुओं को बढ़ाने वाला, मस्तिष्क पोषक श्रेष्ठ बाजीकर, बढ़ती आयु को स्थापित करने वाला, आयुवर्धक, हड्डी जोड़ने वाला, रसायन, ग्रहणी विकार, पाण्डुरोग, दाह, प्यास और हृदय रोग में हितकर है।

इसके अलावा कई आधुनिक अध्ययनों और शोधों में सामने आया है कि गोदुग्ध आपके हृदय की जरूरी पोषण देकर उसे स्वस्थ रखता है, यह सम्पूर्ण आहार है। यह भरपूर कौल्सियम देता है, दाँत तथा हड्डियों को मजबूती देता है।

एक रिसर्च रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है कि हार्ट अटैक से बचाव के लिए रोज दोपहर में ३० ग्राम तक ताजे दही का सेवन करना चाहिए, यह हाई ब्लडप्रेशर के खतरे को कम करता है साथ ही कोलेस्ट्राल को घटाने में मदद करता है, दही में प्रोटीन, विटामिन, कैल्शियम और सैचुरेटेड फैट्स अच्छी मात्रा में होते हैं जो आपके हार्ट को स्वस्थ रखते हैं। उधर हमारे वैदिक चिकित्साचार्य बता गये हैं-

दधिस्वाद्वग्निदंहृद्यं स्नेहनं रोचनं गुण।
पाकेऽम्लमुष्णं वातघ्नंमाङ्गल्यं बृंहणं परम्।।

(राज वल्लभ)

दही- स्वादिष्ट अग्नि (पाचनशक्ति/इम्युनिटी) बढ़ाने वाला, हृदय के लिए हितकर, स्निग्ध, रुचिकर, भारी, पाक में अम्ल, गरम, वात नाशक, मंगल कारक एवं दुष्टि कारक है। पर ध्यान रखना है इसकी मात्रा ३० ग्राम है और केवल दिन में तथा शरद, ग्रीष्म और वसंत ऋतु में अहितकर तथा हेमंत, शिशिर और वर्षा ऋतु में औषधीय गुण रखता है। ऐसा दुनिया के प्रथम शल्य वैज्ञानिक आचार्य सुश्रुत बताते हैं। शास्त्र यहाँ तक आगाह करता है-

‘‘नियम विरुद्ध तरीके से दही सेवन से ज्वर, रक्तपित्त, विसर्प, कुष्ठ, पाण्डु, भ्रम कामला आदि अनेकों रोग उत्पन्न होते हैं अत: दही का सेवन नियमों को जानकर ही हो।

चैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के वैज्ञानिकों का यह कहना है कि यदि मक्खन, (गाय) के घृत को छोड़कर अन्य वनस्पति तेलों का सेवन करते हैं तो यह आपके हार्ट को नुकसान पहुँचा सकता है। मक्खन और (गो) घृत में विटामिन खनिज आपको स्वस्थ रखते हैं। पर इसकी भी निर्धारित मात्रा ही सेवन करना है।

जॉर्ज इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता कैथी ट्रीयू कहती है कि तमाम सुबूत बताते हैं कि दूध, दही, मक्खन, घृत, पनीर आपके स्वास्थ्य को सकारात्मक रूप से फायदा पहुँचाते हैं इनमें फैट के अलावा अन्य जरूरी पोषक तत्व भी है जो आपके लिए बहुत लाभप्रद हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि हमारे अध्ययन और शोध इस बात का प्रमाण देते हैं कि डेयरी फैट को कम करना या उनसे पूरी तरह से परहेज करना हार्ट की सेहत के लिए सबसे अच्छा विकल्प नहीं हो सकता। अब वैदिक चिकित्सा वैज्ञानिकों को पढ़ें वे कहते हैं-

‘नवनीतं नवं ग्राहिहृद्यंचोल्वणदीपकम्।’ (हा.सं.) ताजा मक्खन ग्राही हृदय के लिए बहुत ही हितकर पाचन शक्ति और इम्युनिटी को बढ़ाने वाला है। वे तो यहाँ तक कह देते हैं कि ताजा मक्खन ‘सर्वदोषापहं शीतंमधुरं रसपाकयो:।।’ अर्थात् यह सर्व दोष नाशक है। दुनिया के महान् चिकित्सा वैज्ञानिक आचार्य चरक मक्खन को साफ-साफ हृदय के लिए लाभकर बताते हैं- संग्राहि दीपनं हृद्यं नवनीतं नवोद्घृतम्।। च.सू. २७/२३०।। यह भूख बढ़ाकर (इम्युनिटी बढ़ाकर) हृदय को सीधे लाभ करता है पर हो एकदम ताजा।

ऐसे ही गोघृत राज निघण्टुकार- ‘हृद्धितम्’ कहते हैं यानी हृदय के लिए हितकारी है।

आचार्य चरक गोघृत संस्कारित घृत सेवन का निर्देश देते हैं वे कहते हैं कि यदि गोघृत को विभिन्न द्रव्यों से संस्कारित कर दिया जाय तो इसमें हजार गुनी ताकत आ जाती है और हजारों कार्य करने की सामर्थ।

‘‘सहसुवीर्यं विधिभिर्घृतं कर्मसहस्रकृत्।।" च.सू. २७/२३०।। अब कितने प्रमाण चाहिए। पर इन सबका सेवन हो आयुर्वेदीय, दक्ष (Expert) चिकित्सक के निर्देश हो।

हार्ट रोगियों के अकाल मौत का एक सबसे बड़ा कारण यह भी है कि इधर आधुनिक डॉक्टर रुक्ष, दुर्बलता पैदा करने वाली, ओज, वीर्य, पौरुषशक्ति को क्षीण करने वाली ‘एस्प्रीन’ जैसी दवायें खिलाना शुरू करते हैं, उधर गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत, गोमक्खन जैसे शरीर के उत्तम पोषक पदार्थों का सेवन भी बन्द करा देते हैं ऐसी स्थिति में फिर क्यों न जीवनक्षय हो।

इसलिए केवल अन्धानुकरण करके, हार्ट, अटैक से बचने के लिए गोघृत, गोदुग्ध आदि का सेवन बन्द नहीं करना चाहिए, अन्यथा अच्छे परिणाम नहीं होंगे। सुयोग्य आयुर्वेदीय चिकित्सक से परामर्श कर हृदय रोगी इनका सेवन अवश्य करें इससे दीर्घायु और आरोग्य की प्राप्ति होगी।

लेख पढ़ने के बाद आप अपने विचार और नाम/पता व्हाट्सएप में लिखें।
हम सारगर्भित विचारों को आयुष ग्राम मासिक और चिकित्सा पल्लव में स्थान देंगे।

सर्व प्रजानां हितकाम्ययेदम्

"चिकित्सा पल्लव" - मासिक पत्रिका
अंक-6, मार्च -2022

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प्रधान सम्पादक

आचार्य डॉ. मदनगोपाल वाजपेयी

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