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5 दिन में यूरिया, क्रिटनीन घटकर समाधान मिला आयुष ग्राम में!!

आयुर्वेद को समाज और राष्ट्र की जरूरत बनाना होगा!

रोगी साध्य अवस्था में आ जाय, निदान सही हो तो सफलता शीघ्र और शत प्रतिशत!!

आयुर्वेद को ऐसा फिर से बनाना होगा कि समाज और राष्ट्र की जरूरत बन जाय। तभी मानवता का सही मायने में हित हो सकता है।

विजयादशमी 2 अक्टूबर 2025 के पूर्व रात्रि 10 बजे चित्रकूट के पुलिस अधीक्षक डॉ० अरुण कुमार सिंह की मेरे पास कॉल आयी पूछा गुरु जी! कल आप ओपीडी में बैठेंगे? मैंने कहा कि कल तो विजयादशमी है अवकाश है।

उन्होंने कहा कि बड़े भइया आए हैं उनका इलाज लखनऊ राममनोहर लोहिया मेडिकल साइंसेज में चल रहा है, उन्हें दिखाना है। मैंने कहा कि आप कल 10 बजे भेज दें हम ओपीडी में पहुँच जायेंगे।

इसी क्रम में मुझे यह लिखने में गर्व हो रहा है कि चित्रकूट जिले को ये ऐसे पुलिस अधीक्षक प्राप्त हैं जो दर्शन शास्त्र से पी०एच-डी० अत्यन्त चुस्त, प्रशासक किन्तु पूर्ण योगी और व्यवहारिकता सामाजिकता से सम्पन्न।

2 अक्टूबर 2025 को उनके परिजन भइया श्री ज्ञान प्रकाश सिंह को लेकर ‘आयुष ग्राम चिकित्सालय’ आ गये उन्हें तो दो लोग दोनों ओर से पकड़े थे, इस स्थिति में ओपीडी में आये। प्रथम दृष्ट्या ऐसा लग रहा था कि मानो पक्षाघात हो गया हो। पूछने पर उन्होंने रोगाक्रान्त होने की कहानी बतानी शुरू की जो कि उल्टी और चक्कर से शुरू हुयी और चिकित्सा लेते-लेते फिर लखनऊ डॉ० राममनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान पहुँच गये। अब वहाँ की चिकित्सा चल रही थी, किडनी प्रभावित हो गयी है।

हमने नाड़ी देखी जो वात पित्त प्रधान उग्ररूप से चल रही, उनके पैरों की ओर निगाह डाली तो देखा दोनों टखने (Ankle Joint) में जोरदार सूजन। हमने तुरन्त कहा कि अरे! इनका तो सीआरपी बढ़ा है।

फिर हमने लखनऊ डॉ० राममनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान की जाँच रिपोर्ट देखी तो वहाँ सीआरपी का परीक्षण ही नहीं कराया गया था बल्कि किडनी फंक्शन आदि की जाँच करायी गयी थी जिसमें यूरिया, क्रिटनीन आदि बढ़ा था।

3 अक्टूबर 2025 शुक्रवार को हमने उनका रक्त परीक्षण कराया तो यह देखकर दंग रह गये कि सीआरपी 50.9 M/L था जो कि अधिकतम 6 M/L तक होता है। यूरिया 51.6 Mg/dl, क्रिटनीन 1.9 Mg/dl, सोडियम 128.5, हेमोग्लोबिन 10.8 gm था, मूत्र परीक्षण में प्रोटीन आदि अनुपस्थित थे।

एलोपैथ में जो चिकित्सा चल रही थी वह ब्लडप्रेशर की 3 गोलियाँ, यूरिक एसिड कम करने की 2 गोलियाँ और बुखार के लिए पीसीएम 650 एमजी और किडनी के लिए कुछ दवा तथा सोडाबाई कार्ब था। सीआरपी के लिए कोई दवा नहीं, जिसके कारण और भयंकर गुल्फ संधिशोथ उनका चलना-फिरना क्या जमीन पर पैर रखना दुरुह था।

हमने आश्वस्त किया कि कोई चिंता की बात नहीं 5 दिन में रोग को काबू में कर लेंगे और 15 दिन में चला देंगे, अब फिर उन्हें आयुष ग्राम चिकित्सालय के अन्तरंग विभाग (आईपीडी) में भर्ती कर लिया।

हमने सम्प्राप्ति निर्धारण के पश्चात् पित्तानुबन्धी आमवातज वृक्काकर्मण्यता (सज्वर) रोग निदान किया और आश्वासन दिया कि 5 दिन में रोग को काबू में कर लेंगे और 15 दिन में चला देंगे। हमने रोग की सम्प्राप्ति इस प्रकार विनिश्चय की-

हेतु सेवन ➡ कफ प्रधान पित्तवात दुष्टि ➡ मन्दाग्नि ➡ आमप्रधान विदग्ध विष्टब्धाजीर्णता ➡ दूषित वात का बाह्य शिराओं में गमन, कफ, रक्त, पित्त की दुष्टि ➡ मार्गावरोध ➡ गुल्फसंधिस्थान संश्रय ➡ सशोथ ज्वर ➡ कुचिकित्सा ➡ पित्तानुबन्धी आमवातज वृक्कामयता।

भगवान् धन्वन्तरि स्पष्ट कहते हैं कि ऐसी अवस्था में-

हृदयोद्वेष्टनं तन्द्रा लालास्रतिररोचक:।
दोषाप्रवृत्तिरालस्यं विबन्धो बहुमूत्रता।
गुरूदरत्वमस्वेदो न पंक्ति: शकृतोऽरति:
स्वाप: स्तम्भो गुरुत्वं च गात्राणां वह्निमार्दवम्।
मुखस्याशुद्धिरग्लानि: प्रसंगी बलवाञ्ज्वर:।।

सु० उ० 39/117-120।।

आमज्वर की स्थिति बनती है परिणामत: हृदय में हलचल, तन्द्रा, भोजन में अरुचि, निश्चलता, आलस्य, वायु और पुरीष का सम्यक् न निकलना, मूत्र की अधिक प्रवृत्ति, पेट में भारीपन, पसीना न आना, चित्त की अस्थिरता, अंगों में सुन्नपन, अपक्व पुरीष की प्रवृति, अंग में जकड़ाहट, भारीपन, अग्निमांद्य, मुख का स्वाद ठीक न रहना, कुछ ग्लानि, शरीर में अकड़ाहट और ज्वर होता है।

भगवान् धन्वन्तरि यह भी बताते हैं कि- इस अवस्था में भयंकर पीड़ा होती है-

यत्रस्थमामं विरुजेत्तमेव देशं विशेषेण विकारजातै:।
दोषेण येनावततं स्वलिंगैस्तं लक्षयेदामसमुद्भवैश्च:।।

सु० उ० 56/10।।

अर्थात् ‘आम’ दोष (एक अविपक्व दुर्गन्धित रस) (जिसकी तुलना सीआरपी से करणीय) नामक दूषित पदार्थ जहाँ पर स्थित होता है उस स्थान में विशेष पीड़ा उत्पन्न करता है। उसमें सुई छेदने जैसी पीड़ा, जकड़ाहट, आध्मान आदि लक्षण रहते हैं।

अब हमने इस प्रकार चिकित्सा व्यवस्था निर्धारित कर अपने सी०आर०ए०वी० शिष्य डॉ० अनुराधा कुमारीं को सौंप दिया -

  • 1. पंचकर्म चिकित्सा में- (आमपाचक, रक्तशोधक वस्ति, मूत्रल, मलावरोध नाशक शोथघ्न), वासा, पुनर्नवा, पटोलपत्र, गिलोय, नीम, भूमिआँवला आरग्वध मिश्रित क्वाथ की निरूहवस्ति।
  • 2. मंजिष्ठादि कषाय लघु (भै०र०) (कु०रोग०) 20-20 मि०ली० खाली पेट सुबह 7 बजे और शाम 5 बजे।
  • 3. वृहद्वातगजांकुश रस 1 गोली ± कैशोर गुग्गुल 2 गोली, त्रैलोक्य चिन्तामणि रस (भै०र० रसायन प्रकरण) 125 मि०ग्रा० 1x2।
  • 4. अनुपान- अखिलदोषजज्वरहर कषाय (सहस्रयोगम्) 10-10 मि० ली० आम पाचनार्थ और निहिरणार्थ।
  • 5. त्र्यूषणाद्यगुटिका (शाङ्गधर संहिता) 1-1 ग्राम दिन में 2 बार।
  • आहार में - प्रमथ्या, शुण्ठी चूर्ण डालकर।
एस०पी० साहब अचानक आ धमके

3 अक्टूबर 2025 से चिकित्सा शुरू हुयी। उसी रात में 10.30 के आसपास एस०पी० साहब ने फोन कर भइया के हाल-चाल पूछे, तो उन्होंने घबराहट, के साथ-साथ शिथिलता और सारीr परेशानी बता दी।

अब क्या था एस०पी० साहब 11 बजे रात में चिकित्सालय परिसर आ धमके। रात्रि ड्यूटी में लगे हमारे पैरामेडिकल स्टॉफ से बात की फिर डॉ० वेदप्रताप जी को बुलाया, डॉ० वेद जी ने बताया कि कोई दिक्कत नहीं, सब मैनेज हो जायेगा। अभी तो पहला दिन है। एस०पी० साहब रात 1 बजे तक ‘आयुष ग्राम’ में रुके रहे।

4 अक्टूबर 2025 को एस०पी० साहब पूर्वान्ह में फिर आ गये उन्हें यह बात परेशान कर रही थी कि कहीं किडनी समस्या न बढ़ जाय, यूरिया, क्रिटनीन और न बढ़ जाय।

मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि इनकी मूल समस्या ‘किडनी डिजीज’ नहीं है बल्कि सीआरपी बढ़े होने और चिकित्सा में ‘सेन्थेटिक मेडिसिन’ के प्रयोग से यूरिया, क्रिटनीन बढ़ गया है। 5 दिन में सब नियंत्रण में हो जायेगा।

अब एस०पी० साहब सायंकाल फिर आये। संतुष्टी के भाव थे। उन्होंने बताया कि मैंने कानपुर, प्रयागराज के कुछ ‘मॉडर्न मेडिसिन’ के डॉक्टर्स से बात की तो उन्होंने बताया कि आप चिन्ता न करें आयुर्वेद में भी किडनी की बहुत अच्छी दवायें और चिकित्सा अविष्कृत हुयी हैं।

आश्चर्यजनक परिणाम आया

5 अक्टूबर 2025 को हमने जब रक्त परीक्षण कराया तो क्रिटनीन 1.9 से घटकर 1.5 तथा यूरिया 45.2 आ गया। सभी ने राहत की सांस ली।

इधर उनके गुल्फसंधिशोथ और मानसिक शारीरिक स्थिति में भी सकारात्मक परिवर्तन आया।

इसी क्रम में हम यह भी बताते चलें कि सीआरपी बढ़कर यदि गुल्फ संधि (Ankle Joint) पकड़ ले तो इतनी भयंकर पीड़ा होती है कि यदि कोई आक्रान्त स्थल की ओर उँगली भी दिखा दे तो रोगी छटपटा जाता है।

हमने विनोद में यह बात कही भी कि आपका क्षत्रिय रक्त है तो इतना सीआरपी बढ़ा होने पर पीड़ा को सहन कर रहे हैं कदाचित् ब्राह्मण रक्त होता तो वह सहन ही नहीं कर सकता था।

यह सुनकर सभी हँस पड़े और एस०पी० साहब तो दर्शन शास्त्र से पी०एच-डी०, प्रखर और तर्क पूर्ण समसामयिक वत्तृâत्व सामर्थ्य और व्यवहारिकता सम्पन्न उनके बारे में कहना ही क्या है।

एक बात और लिखते चलें कि भइया ज्ञानप्रकाश के पैरों में नमक पानी की सिंकाई पहले से करायी जा रही थी, उसे हमने तत्काल बन्द कराया, क्योंकि पित्त प्रकोप की शरद् ऋतु, परिणामत: पित्तानुबन्ध अत: दिन में कई बार बर्फ की सिंकाई होनी चाहिए। हमने वह शुरू कराया। इस कार्य को आयुष ग्राम चिकित्सालय की वरिष्ठ नर्स वन्दना यादव ने सम्हाला।

जब मैंने बर्फ की सिंकाई की बात कही तो एक बार तो सभी आश्चर्य चकित, लेकिन स्वीकार किया।

8 अक्टूबर 2025 को रक्त परीक्षण कराया तो हेमोग्लोबिन 10.8 से बढ़कर 11.5, क्रिटनीन 1.6 से घटकर 1.5, यूरिया 45.2 से घटकर 37.8, सीआरपी 50.9 से घटकर 42.9 हो गया।

रिपोर्ट देखकर सभी बहुत प्रसन्न हुये, तब हमने कहा कि इनकी मूल बीमारी किडनी प्राब्लम नहीं है वह तो सही रोग परीक्षण न होने के कारण और केवल लक्षण दबाने की दवा देने से हुआ।

इसके बाद उन्होंने शनिवार 11 अक्टूबर 2025 को लखनऊ जाकर डॉ० राममनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में रक्त परीक्षण कराया तो यूरिया 30.87 Mg/dl तथा क्रिटनीन 1.17 Mg/dl हो गया, हेमोग्लोबिन 12.10 हो गया।

एस०पी० साहब ने स्वयं यह रिपोर्ट हमें व्हाट्स-अप पर भेजी। उनके भाव, श्रद्धा और विनम्रता का उल्लेख हम व्यक्त नहीं कर सकते।

19 अक्टूबर 2025 को जांच करायी तो हीमाग्लोबिन 12.6 Mg/dl, यूरिया 32.2 Mg/dl, क्रिटनीन 1.3 Mg/dl और सी०आर०पी०17.4 M/L था।

इस लेख को लिखने का हमारा उद्देश्य केवल यह है कि आयुर्वेद क्षेत्र में कार्य करके इसे ऐसे ही उभारना पड़ेगा और आयुर्वेद के सामर्थ्य को दुनिया के समक्ष रखना होगा, ताकि समाज और राष्ट्र आयुर्वेद को आवश्यक समझें तथा सरकार से इसे बढ़ाने की माँग करें।

आयुर्वेद के पदों में बैठे सरकारी अधिकारियों को आयुर्वेद की सामर्थ्य, आयुर्वेद की कार्मुकता का संवर्धन करना होगा, इसके सामर्थ्य का प्रचार-प्रसार करना होगा ताकि पीड़ित मानवता की पीड़ा मिट सके।

विचार करिये कि यदि एस०पी० साहब, भइया जी को ‘आयुष ग्राम’ न भेजते तो लगभग एक माह से वैसे ही बेचारे एलोपैथ चिकित्सा कराते-कराते पीड़ा झेल रहे थे और आगे एलोपैथ में किडनी डिजीज के उपचार शुरू हो जाते।

क्योंकि आज स्थिति यह बन गयी है कि एलोपैथ में चाहे जो किया जाय, चाहे गलत तरीके से खाँसी के सीरप लिखे जायें उनसे मौतें हों या अनावश्यक बच्चेदानी के ऑपरेशन हों, जरूरत न होने पर भी डायलेसिस किया जाय। भारत की जनता आँख मूँदकर विश्वास कर रही है। क्योंकि उन्होंने आधुनिक वैज्ञानिक साधनों और पेनफुल बीमारियों के उपचार में तत्काल राहत प्रदर्शित की।

किन्तु अब समय आ गया है कि आयुर्वेदज्ञ अपनी विशेषता, विशेषज्ञता और प्रभावशालिता प्रदर्शित कर ऐसे पीड़ितजनों, भटके लोगों को राह पर लायें।

और भारत के प्रबुद्ध जनों को भी चाहिए कि रोग के प्रारम्भ में ही आयुर्वेद चिकित्सा में पहुँचें शोधन चिकित्सा आदि का भरपूर उपयोग करें। इसी से समाज और राष्ट्र का हित है। सभी को सही चिकित्सा मिलने लगेगी। किन्तु आयुष ग्राम में तो 10,12,15,16 क्रिटनीन बढ़ने पर और अब डायलेसिस घोषित होने पर आते हैं तब भी हम बहुत कुछ कर लेते हैं।

हम अपने देश के आयुर्वेद चिकित्सकों को अपना ज्ञान और अनुभव देने को तत्पर हैं ताकि वे मानवता का अधिक से अधिक कल्याण कर सकें। जब से भारत सरकार आयुष मंत्रालय की राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ ने हमें ‘गुरु’ पद पर स्थापित कर गुरु शिष्य परम्परा में आयुर्वेद के शिक्षण-प्रशिक्षण का दायित्व दिया तब से हम और ऊर्जा से अपने दायित्वों का निर्वहन कर उन्हें अपने ज्ञान, अनुभव और विधि प्रदान कर मानवता की सेवा के लिए शिष्यों को तैयार कर रहे हैं।

अब तो हम मार्च २०२६ से प्रतिवर्ष १० आयुर्वेदाचार्य को अपने यहाँ रहने और सीखने का अवसर देने की योजना बना रहे हैं। बस! उन्हें प्रशिक्षण काल में और आगे भी महर्षि चरक/सुश्रुत द्वारा निर्दिष्ट शिष्योपनयन संस्कार, कर्त्तव्य तथा विधान का पालन करने का संकल्प करना होगा।

हम सुधी चिकित्सकों और आयुर्वेद के शोधार्थियों के लिए दिये गये चिकित्सा व्यवस्था पत्र का विश्लेषण कर दें कि यहाँ पर हमने दोष प्रत्यानीक, व्याधि प्रत्यानीक और निदान परिवर्जन तीनों चिकित्सा विधियों को अपनाया।

भगवान पुनर्वसु आत्रेय स्पष्ट कहते हैं कि -

निदानदोषर्तुविपर्ययक्रमैरुपाचरेत् तं बलदोषकालवित्।।

च०चि०12/16

अर्थात् विद्वान चिकित्सक को रोग के बल दोष काल को अच्छे से संज्ञान में लेकर रोग के सही कारण, दोष, ऋतु के विपरीत क्रम से शोथ रोग की चिकित्सा करनी चाहिए।

आज भले ही एलोपैथी चिकित्सा विज्ञान पर्याप्त उत्पन्न हो गया है पर एलोपौथ में चिकित्सा करते समय दोष और ऋतु का ज्ञान और ध्यान रखकर कहाँ चिकित्सा की जाती है इसी का दुष्परिणाम है कि रोग बिगड़ रहे हैं नये-नये स्वरूप में आ रहे हैं या चिकित्सा में लम्बा समय लग रहा है और रोगी, एलोपैथ के आधुनिक होने के विश्वास में मान लेते हैं कि रोग ऐसा ही है और जो हो रहा है वह ठीक हो रहा है।

इस प्रकरण में पूरी तरह ध्यान रखा गया कि शरद ऋतु है परिणामत: पित्त का संचयानन्तर प्रकोप है ही उसी के परिणाम स्वरूप बीमारी के प्रारम्भ में ‘वमन’ होता रहा, चक्कर आता था। चरक स्पष्ट कहते हैं कि यदि शोथ का जनक पित्त है तो भ्रमज्वरस्वेद तृषामदान्वित:। स उष्यते स्पर्शरुगाक्षिरागकृत् .................भृशदाह।। च०चि०12/13

अर्थात् चक्कर, ज्वर, प्यास, छूने से भयंकर पीड़ा, आँखों में लालिमा और दाह।

वात के साथ होने के कारण ‘अरुणोऽसित: .............हर्षार्तियुतोऽनिमित्तत:। प्रशाम्यति प्रोन्नयति प्रपीडितो।। च०चि०12/12।।

लालिमा कुछ कालिमा लिये रोमांच आना, दबाने से गड्ढ़ा हो जाना किन्तु फिर उभार हो जाना।

चिकित्सा में भगवान पुनर्वसु आत्रेय निर्देश देते हैं -

अथामजं लंघनपाचनक्रमैर्विशोधनैरुल्वण दोषमादित: .................।। च०चि०12-17-18।।

कि शोथ में यदि ‘आम’ दोष की भूमिका है तो सर्वप्रथम लंघन, पाचन का प्रयोग करें। शरीर के निचले भाग में सूजन हो तो विरेचन का उपयोग हो यह भी ध्यान रखना चाहिए कि रोग का उत्पादक ‘वात’ हो तो मलबद्धता हो तो निरूहवस्ति का उपयोग करें।

तभी हमने गिलोय पुनर्नवा, पटोलपत्र, निम्ब, भूमिआँवला और आरग्वध की निर्मित निरूहवस्ति का उपयोग कराया। तो उधर मंजिष्ठादि कषाय लघु का प्रयोग भी। क्योंकि मंजिष्ठादि क्वाथ में मंजिष्ठा, हरितकी, विभीतकी, धात्री, कुटकी, वच, दार्वी, अभया, निम्बत्वक है जिसके घटक द्रव्य बताते हैं कि यह ‘कल्प’ वातरक्त (उदल्ू) नाशन के साथ-साथ ‘विट् विबन्ध’ नाशक का भी अद्भुत सामर्थ्य है तो यकृत् को बलवान् बनाने और छोटी आँत्र में परिसंचरण कर रहे दूषित पित्त को बाहर करने का भी सामर्थ्य है। इस विधि से पित्त के बहिर्गमन होने से आश्रय आश्रयी भाव से रक्त भी शुद्ध हो जाता है। हम इस क्वाथ का निर्माण ‘रस क्रिया’ से कराते हैं।

गिलोय का (दोषत्रयामतृड्दाह........पाण्डुताम्।। भा० प्र०) त्रिदोष, आम, ज्वर, प्यास, दाहनाशक गुण, तो भूमिआँवला (‘‘पित्तास्रकफा- पाण्डुक्षतापहा।।’’ (भा०प्र०) का पित्तरक्ताविकार कफ खून की कमी नाशक गुण (‘मूत्ररोगार्तिशमनी’ (रा०नि०) तो और मूत्र रोग नाशन गुण पुनर्नवा का (शोफानिलगरश्लेष्महरी, पाण्डुघ्नी, दीपनी, परा।। भा० प्र०।।) शोथ, वायु, विष, कफ, खून की कमी, भूख न लगने की समस्या नाशन गुण, नीम का ‘सर्वारोचक कुष्ठनुत्’ (भा०प्र०) गुण तो आरग्वध का (चतुरंगलो मृदुविरेचनानां (श्रेष्ठम्) (च०सू०२५) तो कोष्ठपित्त कफापहम्।। भा०प्र०।।) मृदुविरेचन, कोष्ठ, पित्त और कफशामक गुण का अवधारण कर निरूहवस्ति का प्रयोग कराया जिससे विरेचन और अस्थापन का कार्य एक साथ होता गया।

परिणाम यह आया कि कफ प्रधान पित्त वात दुष्टि मिटने लगी, अग्नि वर्धन का कार्य होने लगा, आम (सी०आर०पी० जैसा जहर) वस्ति द्वारा शरीर से बाहर होने लगा तो विदग्धता और विष्टब्धता मिटकर वायु का अनुलोमन होने लगा, इससे वात के बाह्य शिराओं में गमन द्वारा कफ, रक्त, पित्त को दूषित करने का कार्य रुकने लगा। यही सारा कार्य दोष और ऋतु के विपरीत क्रम करणीय था।

बर्फ की सिंकाई भी इस क्रम एक विशेष सहयोगी की भूमिका निभा रहा था। बस क्या था गुल्फ संधि स्थान (Ankle Joint) की सूजन घटने लगी और पीड़ा कम होने लगी, ज्वर कम होने लगा।

वृ.वातगजांकुश रस में पारदगन्धक की कज्जलीr के साथ अभ्रक, ताम्र, शुद्ध हरताल, स्वर्ण भस्म, वत्सनाभ के अलावा त्रिकटु, हरितकी, कर्कट शृंगी, टंकण, कट्फल और बलामूल, धान्यक के अलावा मुण्डी, निर्गुण्डी की भावना है। जो इस रोग के कारण क्षतिग्रस्त हुये ऊतकों की मरम्मत अपने रसायन, धातु पोषक गुणों से करता है तथा अग्नि का वर्धन बनाये रखते हुए नये ‘आम’ का निर्माण नहीं होने देता, ज्वरघ्न और शूलघ्न गुणों से ज्वर और पीड़ा विनाशन भी करता है। इसीलिए रसेन्द्र सार संग्रह कार ने इसकी गुणवत्ता में ‘साध्यासाध्यं सर्वा वातप्रशान्तये। निहन्त्याशु वृहद्वातगजांकुश:।।’ लिखा है। इसमें जब त्रैलोक्य चिन्तामणि रस को शामिल कर दिया जाता है तो फिर बलवर्धन, ओजवर्धन, धातु परिपोषण आदि का कार्य और श्रेष्ठ होने लगा। इस प्रकार यदि हम इस चिकित्सा व्यवस्था पत्र का सम्पूर्ण विरेचन करते हैं तो पूरी पुस्तिका तैयार हो जाएगी।

परिणामतः जब रक्त परीक्षण कराया गया तो हानिकारक सारे पैरामीटर घटने और हटने लगे। यूरिया, क्रिटनीन घटले लगे तो हीमोग्लोबिन आश्चर्य जनक रूप में बढ़ने लगा।

19 अक्टूबर 2025 की जांच में तो सी0आर0पी0 42.9M/L से घटकर 17.4 M/L हो गया। जो स्पष्ट संकेत कर रहा था श्री ज्ञान प्रकाश सिंह भइया में गुल्फसंधि (Ankle joint) से लेकर, किडनी, आँतें और शरीर के अन्य आन्तरिक अवयवों की सूजन बहुत घट गयी। अब वे अपने से चलने लगे।

21 अक्टूबर 2025 को भइया श्री ज्ञान प्रकाश सिंह कई टोकरी फल, कई डिब्बे मिठाइयाँ लेकर आयुष ग्राम आये और सभी स्टॉफ को अपने हाथों से बाँटा।

विचार करें कि इस समय देश में आयुर्वेद के आशुकारी और प्राणाभिसरीय चिकित्सक तैयार करने की सर्वाधिक आवश्यकता है आयुर्वेद चिकित्सकों को चिकित्सा के सांगोपांग विधियों में दक्ष होने की आवश्यकता है, युवा चिकित्सकों को शास्त्र अध्ययन और उसका गहन चिंतन पर जाने की जरूरत है। ताकि पीड़ित मानवता का कल्याण हो सके। आशा है कि हमारे इस विश्लेषणात्मक लेख से आयुर्वेद की सामर्थ्य समझकर सभी लाभ उठा सकेंगे। यदि कोई सुझाव हो अवश्य देंगे।

आयुषग्राम चिकित्सालय के यूट्यूब चैनल एवं फेसबुक पेज पर पूरा वीडियो उपलब्ध है.
लेख पढ़ने के बाद आप अपने विचार और नाम/पता व्हाट्सएप में लिखें।
हम सारगर्भित विचारों को आयुष ग्राम मासिक और चिकित्सा पल्लव में स्थान देंगे।

सर्व प्रजानां हितकाम्ययेदम्

"चिकित्सा पल्लव" - मासिक पत्रिका

आयुष ग्राम कार्यालय
आयुष ग्राम (ट्रस्ट) परिसर
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चित्रकूट धाम 210205(उ०प्र०)

प्रधान सम्पादक

आचार्य डॉ. मदनगोपाल वाजपेयी

राष्ट्रीय आयु०वि० गुरु : भारत सरकार आयुष मंत्रालय आयुष ग्राम (ट्रस्ट) ।
आयुष ग्राम चिकित्सालय सूरज कुण्ड रोड (आयुष ग्राम मार्ग) चित्रकूट 210205

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